26.2.06

कैसे लिखूँ

कैसे लिखूँ कुछ
आज शब्द मानो
पंख लगा
उड़ जाते हैं ।
भागूँ जब मैं
पीछे उनके
किसी अनजान दिशा
मुड़ जाते हैं ।

- सीमा
28 नवम्बर, 1994

15.2.06

ज़िन्दगी के रंग

ज़िन्दगी कभी-कभी
कहीं खत्म सी हो जाती है,
कहीं थम सी जाती है
और फिर कहीं
शुरू हो जाती है /

कहीं उमड़ जाती है
कहीं मचल जाती है
कहीं रेत के बवन्डरों सी
उड़ती चली जाती है /

कहीं हरे-हरे पत्तों पर पडी़
बरखा की बूँदों सी
झिलमिलाती जाती है /
कहीं ठंढी हवाओं सी
बस छू कर चली जाती है /

यूँ ही बदलती रूप रंग
ज़िन्दगी चली जाती है /
थाम ले जिस पल को
वही बस अपना है ;
बाकी की ज़िन्दगी रेत-सी
यूँ ही फिसल जाती है /

- सीमा
१४ अप्रैल, २००४.
सि.

11.2.06

आदमी

अपने आप को बहुत कम
जनता है आदमी /
जो है वह भी अकसर
नहीं मानता है आदमी /

- सीमा
२४ जून, १९९५
ब.व.

6.2.06

ख्वाब

लोग
ख्वाबों से हक़ीकत
बुनने की कोशिश करते हैं /

मैं अकसर कोशिश करती हूँ
हक़ीकत में
ख्वाबों को ढूँढ सकूँ /

- सीमा
६ फरवरी, २००६

1.2.06

चाहत कम नही होती

कहानियाँ पुरानी हो चली
पर यादें पुरानी नहीं होतीं /

दीवारों पर
नए रंग चढ गए हैं,
इमारतें पुरानी हो चली हैं,
पीढ़ियाँ बदल गई हैं
पर इंसानों की
कश्मकश कम नहीं होती /

रंग फीके पड़ते जाते हैं
पर रंगों को
तरो-ताज़ा रखने की
चाहत कम नही होती /

- सीमा कुमार
३१ जनवरी, २००६

और भी हैं रास्ते

आज
शब्दों-छन्दों की दुनिया ने
फिर से मुझे पुकारा है /
जिन्दगी जो बाकी है
तो आँखों में सपने
अभी और भी हैं /
फिर से राहें कहती हैं
आओ,
कदम बढाओ,
पाने को मंजिलें
अभी और भी हैं /
मंजिलें जो हासिल हैं
वहाँ से शुरू होते
नई मंजिलों की ओर
रास्ते अभी और भी हैं /

- सीमा कुमार
२४ जनवरी, २००६