1.2.07

'मेरी कृति' और हिन्दी चिठ्ठाकारी का एक साल

जब मैंने अपना पहला हिन्दी चिठ्ठा लिखा था - और भी हैं रास्ते और कहा था :

फिर से राहें कहती हैं
आओ,
कदम बढाओ,
पाने को मंजिलें अभी और भी हैं /
मंजिलें जो हासिल हैं
वहाँ से शुरू होते
नई मंजिलों की ओर
रास्ते अभी और भी हैं /
वास्तव में मैं कुछ नए रास्तों की ओर बढ़ रही थी .. मंजिलें तो अब भी मिली नहीं हैं पर सफर अब भी जारी है । चिठ्ठाकारी भी एक नया सफर था । वैसे तो मैं चिठ्ठाकारी के एक साल होने पर यहाँ लिख चुकी हूँ मेरे अंग्रेजी चिठ्ठे पर । पर मैं फिर आज यहाँ खासकर धन्यवाद देना चहूँगी रवि कामदार का जिन्होंने हिन्दी चिठ्ठा शुरु करने में कफी मदद की और अनूप भार्गव जी का जिन्होंने मुझे हिन्दी लिखना सीखने और बरहा को लेकर काफी मदद की । इनके अलावा उन सभी का जो मेरी कृति को पढ़ने आते रहे और मेरा उत्साह बढ़ाते रहे ।

मेरी कृति की शुरुआत मैंने कविताओं के लिए की थी पर अब गद्य भी लिखना शुरु कर दिया है । कविताओं को मैं अब भी अलग रखना चहती हूँ । उसके लिए आज ही से एक नया चिठ्ठा शुरु कर रही हूँ - शब्द-जाल ... The Web of Words
[ http://seemaspoems.blogspot.com/ ]

नहीं, यह नया चिठ्ठा नहीं है जहाँ मैं कुछ नया लिखूँगी - यहाँ सिर्फ मेरी कविताओं के लिंक होंगे जो कि मैंने अपने वर्तमान चिठ्ठों पर लिखती हूँ, उनकी लेखन तिथि के क्रमानुसार । और साथ ही अपनी कुछ पसंदीदा कविताओं के लिंक भी इकठ्ठे करूँगी वहाँ :) ।

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