14.2.13

नन्हा सा पल

मेरे एक पल ने
आज फिर मुझसे कहा है
मैं तुम्हारे संग
अपना वह
नन्हा सा पल बाँट लूँ
जो अब तक
बस मेरा होकर रहा है ।
वह पल
जिसमें सिर्फ मैं हूँ,
वह नन्हें कण सा
नन्हा पल
जिसमें सिमट कर
मैं भी एक कण सी
हो गई हूँ
और उसमें सिमट गए हैं
मेरे दुःख-सुख,
मेरे आँसू और खुशी,
आशा और निराशा,
प्रेम और नफरत,
दर्द और चुभन,
तृष्णा और अभिलाषा,
उल्लास और अवसाद ।

वह पल
बस मेरा ही होकर
नहीं रहना चाहता
वह तुम्हारा भी होना चाहता है ।
तुम्हारा भी तो
ऐसा ही नन्हें कण सा
कोई पल होगा,
तुम्हारा बिल्कुल अपना,
केवल तुम्हारा पल ... ।
क्या बाँटोगे
मेरे पल के साथ
तुम अपना पल ?


- सीमा कुमार
१६/६/२००१

* यह कविता 'हिन्द-युग्म' पर प्रथम प्रकाशित हुई और वहां पढ़ी जा सकती हैं |