मैं हर दिन तारों सी झिलमिल । आँखें मेरी सदैव स्वपनिल - रोज पूछती मुझसे आज कौन सा स्वप्न सजाऊँ ? मिटाना है तुम्हें कौन सा अंधियारा ? किस अंतर्द्वन्द्व में दीप जलाऊँ, करे जो रौशन और आशान्वित राहें । रोज़ जलाती हूँ खुद को रोज़ प्रज्वलित होती है एक आग इस आशा में - स्वयं के ही हवन कुंड में स्वाहा हो जाऊँ और उस राख से पुनर्निमित हो निकल आऊँ निर्मल मैं । फीनिक्स की तरह । देह - विकार, कष्ट, क्लेश, लोभ, क्षोभ और अंतर्द्वन्द्व नहीं मिटते इस जीवन में । कभी - कभी मिट जाता है आत्मा का एहसास । नहीं मिटती क्यों अपने ही दुर्गुणों की, दुर्बलताओं की पोथी ? क्यों पन्ने उसमें हर दिन जुड़ते ही जाते ? क्या हर अर्जुन को मिलते हैं कृष्ण ? और जो अर्जुन पांडव - बहन होती तब भी क्या उसे मिलते कृष्ण, मिलती गीता ? - सीमा कुमार ४ सितंबर २००७ यह कविता ' हिन्द-युग्म ' पर प्रथम प्रकाशित हुई और वहां पढ़ी जा सकती हैं |