जब मैं कहती हूँ देखना, एक दिन ऐसा होगा; देखना, एक दिन वैसा होगा तो लोग कहते हैं कब होगा ? कैसे होगा ? मैं कहती हूँ देखना, एक दिन सागर मेरी बाँहों में होगा, फूल मेरी राहों में, और शिलाखंड मेरी राह के पुष्प बन जाएँगे । देखना, एक दिन मैं सूरज की लपटों को छू लूँगी, अंतरिक्ष की गहराइयों में जाकर रहस्यों को खोज लाऊँगी । देखना, एक दिन मेरे सारे सपने सच होंगे, सभी मेरे अपने होंगे ; न कोई वेदना होगी, न निराशा, न पछतावा, न संर्घष, न पराजय । जब मैं कहती हूँ देखना, एक दिन ऐसा होगा ; देखना, एक दिन वैसा होगा तो लोग मुझे अविश्वास से देखते हैं, मुझे विक्षिप्त समझते हैं । चाँद को पाने के लिए मचलने वाला बच्चा क्या अपनी जिद से चाँद को पा लेता है ? परंतु आशा, विश्वास और उत्साह से भरी मैं आँखों में हजारों सपने लिए अब भी कहती हूँ देखना, एक दिन ऐसा होगा ; देखना, एक दिन वैसा होगा, देखना, एक दिन ... । –सीमा 9 जनवरी, 1997