माँ तुमने मुझे जब उड़ना सिखाया था क्या तुम्हें एहसास था एक दिन तुमसे दूर जा बसूँगी अपने नए घोंसले में, नए परिवार के साथ ? तुम्हें खुशी हुई होगी कि मेरे पंख अब मुझे दूर तक उड़ा ले जा सकते हैं, अपने रास्ते खुद तय कर सकूँगी अकेले भी.. । पर संशय तो होगा तुम्हें कहीं थक न जाऊँ, गिर न जाऊँ ... और डर भी होगा - जल्दी ही तुमसे दूर चली जाऊँगी । जब से मैं आई तुम्हारी दुनिया मेरे इर्द-गिर्द ही तो घूमती रही है । दिल थाम तो लेती होगी कि एक दिन तुम्हारा यही केंद्र विस्थापित हो जाएगा, चला जाएगा किसी और जीवन का केंद्र बनने । फिर भी, माँ, तुमने मुझे पूरी तरह पंख फैलाकर, स्वच्छंद होकर उड़ना सिखाया । तुमसे दूर जाकर भी तुम्हारा बसेरा सदैव याद आता और अकसर अपनी यादें तलाशने मैं लौट आती वहाँ ... । अब मेरी बारी है उड़ान सिखाने की और अब भी तुम्हारी ज़रूरत है ... तुम्हारे अनुभव की, वात्सल्य की, पथ-प्रदर्शन की, ताकि मैं भी बेहिचक हो, निर्भय हो, अपनी नन्हीं चिड़िया को और भी ऊँचा उड़ना सिखा सकूँ । - सीमा कुमार ३ अक्टूबर, २००७ यह कविता ...