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प्रकृति की सुन्दरता फूलों से | स्क्रीन सेवर बनाएं और आनंद लें

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प्रकृति की सुन्दरता फूलों से | स्क्रीन सेवर बनाएं और आनंद लें | 

कुछ नई प्रविष्टियाँ

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कुछ नई प्रविष्टियाँ :- * हिन्द-युग्म पर मेरी कविता : बादल का एक टुकड़ा मैं बादल काएक टुकड़ा हूँ और तुम बरखा की शीतल बूँदें.... [ पूरा पढ़ें ] * बाल-उद्यान पर - देखो मैने आटा गूँधा... * यह विडियो जिसमें तेजल के स्कूल में हुए कार्यक्रम में उसने कविताएँ सुनाई थी । और यह रही स्कूल की कुछ और तस्वीरें...

आओ मिलकर खेलें खेल

बाल उद्यान पर भोला बचपन: आओ मिलकर खेलें खेल

नन्हा सा पल

हिन्द-युग्म पर नन्हा सा पल : मेरे एक पल ने आज फिर मुझसे कहा है मैं तुम्हासरे संग अपना वह नन्हा सा पल बाँट लूँ जो अब तक बस मेरा होकर रहा है । वह पल जिसमें सिर्फ मैं हूँ, वह नन्हें कण सा नन्हा पल .... [ पूरा पढ़ें ]

बाल उद्यान पर 'भोला बचपन' और 'दुर्गा-पूजा की सैर'

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बाल उद्यान पर : कीजिये दुर्गा-पूजा की सैर याद कीजिये अपना भोला बचपन

कविता

आज सुबह-सुबह हिन्द-युग्म पर कविता पोस्ट करना था और मैं अपनी डायरी भूल आई थी घर पर । सोचा कुछ नया लिखूँ तो एकदम से माँ की याद आई और यह कविता लिखी - उड़ान । अधिक विश्लेशण नहीं किया, इसलिए कमियों को माफ कीजिएगा । यह कविता उड़ान मेरी माँ को समर्पित है । एक मित्र, जिसे हिन्दी पूरी तरह समझ नहीं आती, ने इस कविता का मतलब पूछा .. और अर्थ बताते-बताते इसे अंग्रेज़ी में अनुवाद कर दिया जो यहाँ पढ़ सकते है । एक बार हर लम्हा एक विस्मय लिखा था अंग्रेज़ी में (Each Moment is a Wonder ) और अनुवाद था हिन्दी में । इस बार हिन्दी में लिखकर अंग्रेज़ी में अनुवाद किया । आप भी पढ़कर बताइए ये दोनों प्रयास कैसे रहे ।

नन्हें खिलाड़ी :)

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वैसे तो यह तस्वीरें मैं यहाँ प्रकाशित कर चुकी हूँ पर २०-२० वर्ल्ड कप जीतने के बाद मेरा फिर से यहाँ प्रकाशित करने का मन किया । बल्ला उठे या न उठे, ये खेलने को तैयार हैं .. तो आप भी इन नन्हें खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाएँ ।

नई प्रविष्टियाँ

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यह रही मेरी बिटिया जो माँ के लिए रोटियाँ बना रही है - और देखिए बाल-उद्यान पर । और यह कुछ पंक्तियाँ यूँ ही बैठे - बैठे .. कुछ गलतियाँ भी रह गई हैं ।

विकास कुमार की आवाज़ में मेरी कविता 'अंतर्द्वन्द्व'

मेरी कविता अंतर्द्वन्द्व अब विकास कुमार की आवाज़ में यहाँ सुने । इसके पहले मेरी कविता हर लम्हा एक विस्मय भी आई थी विकास कुमार की आवाज में । धन्यवाद विकास :)

मेरी कुछ रचनाएँ-- 'हिन्द-युग्म' और 'बाल-उद्यान' पर

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बहुत दिन हो गए मुझे यहाँ कुछ लिखे । घर में एक-एक कर सभी को बुखार, आफिस और साथ ही अन्य व्यस्तताएँ.. कि सोचती ही रह गई फुर्सत से लिखूँगी । 'फुर्सत' सोचने की भी फुर्सत नहीं मिलती !! पर मैं लिखती रही हूँ नियमित रूप से कुछ सामूहिक प्रायासों में जो नीचे हैं.. अपनी मूल्यवान राय और टिप्पणियाँ अवश्य दीजिएगा उन्हें पढ़कर । मेरी कुछ कविताएँ ' हिन्द-युग्म ' पर पर पढ़ी जा सकती हैं : # अंतर्द्वन्द्व - एक नई कविता.. रोज़ जलाती हूँ खुद को रोज़ प्रज्वलित होती है एक आग इस आशा में - स्वयं के ही हवन कुंड में स्वाहा हो जाऊँ और उस राख से पुनर्निमित हो निकल आऊँ निर्मल मैं फीनिक्स की तरह ... [पूरा पढें] # नींद, डर और आँसू - नींद, डर और आँसू पर अलग-अलग कुछ पंक्तियाँ आँसू .... जज़्बात का दरिया है … जो छलक गई बूँदें तो एक-एक बूँद एक तेज़ धार बन जाएगी और हर बाँध निरर्थक .. [पूरा पढें] # स्वप्न की डोरी स्वप्न की अद्भुत डोरी रोज़ रात बाँधती है मुझे बातों में कोरी-कोरी ... [पूरा पढें] # सफ़र अभी है बाकी मिलती गई कई मंज़िलें ऊँचे रहे हम उड़ते सोने की चिड़िया की फिर भी बहुत उड़ान अभी है बाकी ... [पूरा पढ...

हर लम्हा एक विस्मय - पढ़ें हिन्दी में, अंग्रेज़ी में और सुनें भी

जब मैंने हर लम्हा एक विस्मय लिखा था तो सोचा नहीं था उसे विकास कुमार की इतनी अच्छी आवाज़ मिलेगी । सुनने का तो आनंद ही कुछ और आया । धन्यवाद विकास :) जो अभी तक मेरी हिन्दी कविताएँ पढ़ते रहे हैं उन्हें यह बताना चाहूँगी कि हर लम्हा एक विस्मय दरसल मेरी अंग्रेज़ी कविता Each Moment is a Wonder का हिन्दी रूपांतर है । मराठी लेखक-कवि सलील वाघ जी ने जब इसे पढा़ तो मुझसे कहा कि इसी कविता को हिन्दी में लिखूँ - पर वह अनुवाद न हो । उनका अभिप्राय था कि अंग्रेज़ी कविता के भाव हिन्दी में हों । मैंने कहा यह तो बहुत मुश्किल काम है (और वास्तव में इसे हिन्दी में लिखते समय ऐसा लगा भी) । पहले तो मुझे लगा कि यह नहीं हो पाएगा । पर उनकी बात पर अमल करके देखना भी चाहती थी कि क्या बन कर आता है और वह ऐसा क्यों कह रहे हैं क्योनंकि पहले मैंने ऐसा कभी किया भी नहीं था । आखिरकार हिन्दी में लिख तो दिया पर कई जगह समझौता करना पड़ा और फिर भी मुझे लगा कि अंग्रेजी कविता वाली पूरी बात इसमें नहीं आ पाई ... खासकर आखिरी पंक्तियाँ । अंग्रेजी में लिखा : They all kept repeating to me Live, love, evolve, enjoy and cherish Each little m...

पराग और पंखुड़ियाँ

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पराग और पंखुड़ियाँ मैंने जून माह की यूनिकवि प्रतियोगिता के लिए भेजी थी । कविता ८वें पायदान पर रही और पुरस्कार- कवि कुलवंत सिंह की ओर से उनकी काव्य-पुस्तक 'निकुंज' की स्वहस्ताक्षरित प्रति जिसका मुझे इंतजार है । इस कविता में 'अरहुल' शब्द का प्रयोग गुड़हल के फूल के लिए किया गया है । जहाँ मैं पली-बढी़ वहाँ 'अरहुल' का प्रयोग आम भाषा में किया जाता था.. इसीलिए मैंने 'अरहुल' का ही प्रयोग किया है । पराग और पंखुड़ियाँ मेरे +२ के दिनों की लिखी हुई है । सुनील डोगरा ज़ालिम ने टिप्पणी दी है "वैसे अरहुल के फूल कॊ देखने की इच्छा हॊ रही है काश आपने चित्र दिया हॊता।" हिन्द-युग्म पर तो नहीं लगा पाई, पर यहाँ लगा रही हूँ । यह श्याम-श्वेत 'लीनो-कट ग्रफिक प्रिंट' मेरे स्नातक के समय की मेरी कृति है जिसमें अरहुल (गुड़हल) को दिखाया गया है । कृति: सीमा कुमार, १९९७

कविता क्या है.. ?

मेरी अभिव्यक्ति की असमर्थता कल हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हुई । पढ़ कर वहाँ अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें । बचपन से कुछ न कुछ लिखती रही हूँ । जब लिखा तब अपने मन से लिखा .. किसी उद्देश्य को लेकर शायद ही कभी लिखा । कहीं प्रकाशित करने के उद्देश्य से भी नहीं लिखा । हाँ, धीरे-धीरे, समय के साथ औरों के साथ बाँटने लगी । एक आम इंसान की तरह, ज़िदगी की कश्मकश और अलग-अलग रास्तों तथा अनुभवों से गुजरते हुए, मन में जब तरह-तरह के भाव उठते हैं, संवेदनाएँ होती हैं, सवाल उठते हैं, और यह सभी सशक्त होते हैं और उन्हें अभिव्यक्त करने की इच्छा होती है, तो उन्हें शब्दों में ढ़ालने की कोशिश करती हूँ । कागज - कलम और शब्द, यह अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाते हैं । परंतु लिखने के बाद कई बार कई सवाल भी उठ खड़े होते हैं ... एक बहुत आम सा सवाल है "कविता क्या है ?" हर चीज की सुंदर अभिव्यक्ति, छंदो से सुसज्जित रचना ही क्या कविता है ? क्या लिखते समय भावों के प्रवाह से अधिक आवश्यक रचना की रूप-रेखा, उसकी साज-सज्जा, या लेखन के नियम-कानून पर ध्यान देना है ? कविता की सार्थकता किस बात में होती है ? लिखने का क्या उद्देश्य होना च...

तितली का कोना

एक तितली उड़ी थी अपने बागानों से शहर की ओर और खो गई चमचमाती रोशनी और रोशनी के चारों ओर मंडराते पतंगों के बीच । फूल-पत्तों के रंग नहीं थे, तितली के पीछे भागते बच्चे नहीं थे । हाँ, धूल और धुँए से मलिन होते उसके रंग-बिरंगे पंख थे किसी बहुमंजिली इमारत की मुंडेर पर बैठे एकाकीपन का साथ था, और एक सावाल कि आखिर किसकी, किस चीज की तलाश में आई थी वह शहर तक मीलों की उड़ान भरकर रूक-रूक कर, थक-हार कर, जाने क्या-क्या दाँव पर लागा कर... । क्या उसे अपने बागानों का रास्ता फिर से कोई बता सकता था ? या फिर क्या वह ढ़ूँढ़ सकती थी, बना सकती थी कोई नया उपवन फूल-पत्तियों से भरा, रंगों से भरा, खिलखिलाते बच्चों से भरा, एक अलग कोना इन बहुमंजिली इमारतों के बीच ? - सीमा कुमार ६ जून, २००७

कुछ और तस्वीरें - निफ्ट दिल्ली के 'फ़ैशनोवा' की

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यहाँ कुछ और तस्वीरें हैं १८ मई को निफ्ट दिल्ली के 'फ़ैशनोवा' की जिसे होटल अशोक में आयोजित किया गया था । जिस कंपनी में मैं कार्यरत हूँ, उस कंपनी ने एक छात्रा को कपड़े, सुविधाएँ, आदि प्रदान कर प्रायोजित किया था । सो मैं तो इस बार प्रायोजक बनकर फ़ैशन-शो देखने गयी थी अपनी बिटिया के साथ । किसी भी कला / डिजाइन पाठ्यक्रम में छात्र-छात्राओं के काम का, कला का प्रदर्शन किया जाता है, 'पोर्टफोलिओ' बनाया जाता है, निफ्ट में भी यह सब होता है । साथ ही फ़ैशन-डिज़ाइनट या किसी भी वस्त्र या परिधान डिजाइन पाठ्यक्रम में उनका प्रदर्शन चलते-फिरते इंसानों के उपर सबसे अच्छी तरह से किया जा सकता है । यहाँ प्रदर्शित सारे परिधान आम ज़िन्दगी में पहने जाने वाले हों, यह जरूरी नहीं । कुछ परिधान सिर्फ़ अपनी कल्पना और कलात्मकता दर्शाने कि लिए भी बनाए जाते है । ( जो कि आम तौर पर कई बार विवादास्पद विषय बन जाता है ) । छात्र-छात्राओं के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण दिन होता है - सिर्फ़ इसलिए नहीं कि इस दिन उनके काम का, कलात्मकता का प्रदर्शन होता है, बल्कि इसलिए भी कि औपचारिक तौर पर इस दिन उनका पाठ्यक्रम समाप्त हो जाता...

निफ्ट दिल्ली की 'फ़ैशनोवा'

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१८ मई, २००७, निफ्ट , दिल्ली के २० छात्र-छात्राओं ने होटल अशोक में 'फ़ैशनोवा' में अपने डिज़ाइन संग्रह प्रस्तुत किए । प्रस्तुत हैं कुछ तस्वीरें । निफ्ट के डिज़ाइन पाठ्यक्रम के अंत में, आखिरी सत्र, एक डिज़ाइन संग्रह को सोचने, बनाने और फ़ैशन-शो के माध्यम से प्रस्तुत करने के लिए समर्पित होता है । सभी छात्र-छात्राएँ अपनी पसंद का विषय / 'थीम' चुनते हैं और उसी को लेकर अपना पूरा संग्रह बनाते हैं । फ़ैशन-शो के चमक-दमक के पीछे उन छात्र-छात्राओं की कई महीनों, दिनों और रातों की सोच और मेहनत होती है । और उसी के बाद वह युवा 'फ़ैशन-डिज़ाइनर' कहलाते हैं । फ़ैशन-शो के चमक-दमक के पीछे उन छात्र-छात्राओं की कई महीनों, दिनों और रातों की सोच और मेहनत होती है । और उसी के बाद वह युवा 'फ़ैशन-डिज़ाइनर' कहलाते हैं । यह हैं निफ्ट , दिल्ली युवा 'फ़ैशन-डिज़ाइनर' । इसी तरह हर केंद्र में फ़ैशन-शो आयोजित होता है । फ़ैशन-शो के बाद कुछ छात्र-छात्राओं को पुरस्कार भी दिया गया ।

मेरे कैमरे से निफ्ट की कुछ तस्वीरें - विवरण

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आज काफ़ी दिनों के बाद लिख रही हूँ । मेरे कैमरे से निफ्ट की कुछ तस्वीरें मैंने अपने पिछले चिठ्ठे में दिखाए । उद्देश्य यह था कि उसके बाद वाले में उनके बारे में कुछ लिखूँ । दरसल तस्वीरें पुरानी हैं और उनके बारे में मैंने अपने अंग्रेजी चिठ्ठे पर पहले लिखा था जो यहाँ पढे़ जा सकते हैं । इनमें से कुछ तस्वीरें हैं निफ्ट मुम्बई के नए परिसर की । मैं जब छात्रा थी तब तो यह परिसर नहीं था । दादर में टाटा मिल्स के परिसर के एक हिस्से में तब निफ्ट मुम्बई हुआ करता था । कुछ लोगों को तस्वीरें फ़्लिकर में होने के कारण नहीं दिखाई दे रही हैं इसलिए दोबारा यहाँ दे रही हूँ । कुछ और तस्वीरें हैं पिछले साल निफ़्ट दिल्ली में हुए 'फ़ैशन स्पेक्ट्रम' की जो निफ़्ट में होने वाने उत्सवों में से एक है । अलग-अलग कार्यक्रमों के अलावा छात्र-छात्राओं द्वारा फ़ैशन-शो भी आयोजित किया गया था जिसमें सभी कुछ उन लोगों ने ही किया था । ज्यादा लिखने के बजाए तस्वीरों के माध्यम से बोलना अधिक पसंद करूँगी ।

मेरे कैमरे से निफ्ट की कुछ तस्वीरें

www. flick r .com

चिठ्ठा-जगत में वापस

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फुरसतिया जी का कहना है : " सीमाकुमार :- मैंने सीमाजी से कहा था कि वे फैशन डिजाइनिंग वगैरह से जुड़ी बातें बताते हुये लिखना शुरू करें। उन्होंने हां भी कहा था। लेकिन अभी तक उन्होंने केवल कुछेक कविताऒं और चंदेक सूचनाओं से आगे लिखना शुरू नहीं किया है। हमें उनके बहुमुखी लेखन का इंतजार है। " और जैसा कि मैंने कहा, अपना कहा मुझे अच्छी तरह याद है । हाँ, लिखने की गति थोडी़ (या बहुत ) धीमी है । पर लिखूँगी जरूर :)। कुछ समय से अपने परिवार के एक सपने को पूरा करने की तरफ भी कुछ काम कर रही हूँ जिसमें काफी समय लग जाता है । और मेरे भाई की शादी भी थी । शादी की बात आती है तो पारंपरिक शादी एक दिन की तो होती नहीं । हल्दी लगाने आदि की रस्म से शुरू होकर, शादी के बाद भी कई रस्में कई दिनो तक चलती रह्ती हैं । वैसे आजकल की भाग-दौड़ की ज़िन्दगी में यह रस्में भी कम और छोटी होती जा रही हैं । इन रस्मों का भी अपना मज़ा है ... पर आजकल वक्त कहाँ है, नौकरीपेशा लोगों के पास छुट्टियाँ कहाँ हैं ? खैर, जितने थोड़े दिनों की भी छुट्टी मिली, और शादी की भीड़-भाड़ में जितना हो सकता था मिलना-जुलना, खाना-पीना, मौज-मस्ती, सब कि...

प्यार

प्यार अंधेरे में टिमटिमाती हुई एक रोशनी है जो इंसान को अंधेरे से कभी हारने नहीं देती । सीमा १० जुलाई, १९९९ इसे 'कृत्या' पर पढ़ें

रायबरेली में निफ्ट

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http://niftindia.com/downloads/NIFT%20ADVT.pdf निफ्ट की स्थापना १९८६ में भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के अंतर्गत दिल्ली में किया गया था । निफ्ट की इन परिसरों में - दिल्ली , बँगलौर , चेन्नई , गाँधीनगर , हैदराबाद , कोलकाता और मुंबई , अब रायबरेली भी जुड़ने जा रहा है । रायबरेली में निफ्ट की आज शुरूआत - यहाँ देखें ।

निफ्ट से परिचय और सफ़र की शुरूआत

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चिठ्ठों की नई श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए यहाँ लिख रही हूँ । जब मैंने १९९५ में शब्द-जाल लिखा था तब कदापि यह सोच कर नहीं लिखा था कि कुछ ही दिनों में मैं वास्तविक ताने-बाने, सूत और कपड़े के बारे में पढ़ूँगी और वही मेरा व्यवसाय और कार्य-क्षेत्र हो जाएगा । शब्द-जाल पर प्रियंकर जी की टिप्पणी है : "कविता से यह प्रकट होता है कि रचनाकार का संबंध फ़ैशन टेक्नोलॉजी से है. आखिर कबीर की रचनाओं में भी तो ताना-बाना जैसे शब्द और चदरिया बुनने के प्रसंग आते हैं." जब शब्द-जाल लिखा था तब फ़ैशन टेक्नोलॉजी से कोई संबंध नहीं था और न अधिक जानकारी थी थी इस क्षेत्र के बारे में । यह इस क्षेत्र में आने से पहले लिखा था । संयोग कह लीजिए या कुछ और .. दरसल +२ में मैंने विज्ञान विषय पढ़े थे । आम धारणा यह थी कि अगर कोई अपनी पढा़ई और भविष्य के प्रति जागरूक है तो वह या तो अभियंता बनेगा या चिकित्सक .. और कोशिश मेरी भी उसी तरफ थी, चाहे रूचि न भी थी । पर +२ के उन दो सालों में लगा मेरा रूझान कला की तरफ है और मैंने अपने मन की बात सुनने का निर्णय लिया । स्नातक के विषय थे चित्रकला (विशेष) और अंग्रेजी साहित्य तथा दोनों म...

मुठ्ठी भर मीठी रौशनी

तुम्हारे मौन ने कही थी कहानी । सुना था मैंने अनगिनत, मीठे गीत, इन्हीं आँखों की जुबानी । एक मीठा सा एहसास भी था जिसे मैंने मुठ्ठी में बंद कर समेट लेने की कोशिश भी की थी । पर जान गई हूँ एहसास मुठ्ठी में बंद नहीं हुआ करते । रौशनी के तरह बस उजाला फैला जाते हैं जैसे आज भी फैला है तुमसे मेरे जीवन में । - सीमा कुमार ६ फरवरी, २००७ (शादी की सालगिरह पर ।)

'मेरी कृति' और हिन्दी चिठ्ठाकारी का एक साल

जब मैंने अपना पहला हिन्दी चिठ्ठा लिखा था - और भी हैं रास्ते और कहा था : फिर से राहें कहती हैं आओ, कदम बढाओ, पाने को मंजिलें अभी और भी हैं / मंजिलें जो हासिल हैं वहाँ से शुरू होते नई मंजिलों की ओर रास्ते अभी और भी हैं / वास्तव में मैं कुछ नए रास्तों की ओर बढ़ रही थी .. मंजिलें तो अब भी मिली नहीं हैं पर सफर अब भी जारी है । चिठ्ठाकारी भी एक नया सफर था । वैसे तो मैं चिठ्ठाकारी के एक साल होने पर यहाँ लिख चुकी हूँ मेरे अंग्रेजी चिठ्ठे पर । पर मैं फिर आज यहाँ खासकर धन्यवाद देना चहूँगी रवि कामदार का जिन्होंने हिन्दी चिठ्ठा शुरु करने में कफी मदद की और अनूप भार्गव जी का जिन्होंने मुझे हिन्दी लिखना सीखने और बरहा को लेकर काफी मदद की । इनके अलावा उन सभी का जो मेरी कृति को पढ़ने आते रहे और मेरा उत्साह बढ़ाते रहे । मेरी कृति की शुरुआत मैंने कविताओं के लिए की थी पर अब गद्य भी लिखना शुरु कर दिया है । कविताओं को मैं अब भी अलग रखना चहती हूँ । उसके लिए आज ही से एक नया चिठ्ठा शुरु कर रही हूँ - शब्द-जाल ... The Web of Words [ http://seemaspoems.blogspot.com/ ] नहीं, यह नया चिठ्ठा नहीं है जहाँ मैं कुछ...

तेजल कृति का दूसरा जन्मदिन

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तेज भरा हो तुममें तेजल कृतियाँ हों तेरी अनमोल । आँखों में हो सुंदर सपने और होठों पर मीठे बोल । रचना ऐसा कुछ, करना ऐसा कुछ, जिसका नहीं हो कोई मूल्य । बन जाना तुम, इस सृष्टि की तेज से भरी कृति अमूल्य । - सीमा २७ जनवरी, २००७ * कल, २६ जनवरी '०७ को, मेरी बेटी तेजल कृति दो साल की हो गई । यहाँ लिखे कुछ शब्द उसके लिए तथा कुछ मेरे अंग्रेजी चिठ्ठे पर भी ।

शब्द-जाल

कविता - शब्दों का ताना-बाना, शब्दों का जाल । कल्पना के हथकरघे पर अक्षर - अक्षर से शब्दों के सूत कात, जुलाहा बन शब्दों के सूत से वाक्यों का कपड़ा बुन और दर्जी बन एहसास की कैंची से अनचाहे शब्द कतर भावों की सूई से सी कर कवि तैयार कर देता है कविता का मनोहारी वस्त्र; कविता - एक मोहक श्ब्द-जाल । - सीमा २८ अप्रैल, १९९५

चिठ्ठों की नई श्रृंखला

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मेरे नव वर्ष की शुभकामनाओं पर अनूप शुक्ला जी ने लिखा था, आप इस साल निफ्ट से जुड़े कुछ लेख लिखें। मसलन कैसे निफ्ट में चयन होता है, कैसे कपड़े डिजाइन होते हैं, मास-प्रोड्कशन की तकनीक और डिजाइनर वियर कपड़े बनाने की तकनीकियां कैसे अलग हैं। इस बारे में कोई जानकारी नहीं है अपने हिंदी चिट्ठाजगत में! निफ्ट में आयोजित एक फैशन शो मैंने सोचा इस साल कविता के अलावा भी जो चिठ्ठे लिखने के बारे में सोचा था, तो इसी से शुरु करूँ । अनूप शुक्ला जी की बात भी रख लूँगी तथा अपना निजी अनुभव भी बाँटने का मौका मिलेगा । इसलिए अब मैं मेरी कृति पर अपने चिठ्ठों की नई श्रृंखला शुरु करूँगी जिसमें अनूप शुक्ला जी के सुझाव मुताबिक तथा इससे जुड़े विषयों पर लिखूँगी । इस नई श्रृंखला को शुरु करने से पहले इतना ही कहना चाहूँगी कि कपड़ों की एक अलग ही दुनियाँ है । आज कपड़े बनाने के अनगिनत तकनीक हैं; उन्हें सजा - सँवार कर, सिल कर, उपभोक्ता तक लाने के असीमित तरीके - कहीं दर्जी सिलता है तो कहीं थोक में लाखों की संख्या में बनाए जाते हैं । हमेशा कुछ न कुछ नया चलता रहता है इस दुनिया में । साथ ही चमक - दमक और फ़ैशन की रंग - बिरंगी दुनिय...

जाड़े की धूप

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जाड़े की धूप जैसे किसी प्यासे को रेगिस्तान में मीठा पानी मिल गया हो । सर्द रातों के बाद ऐसी खिली जाड़े की धूप जैसे सूर्यमुखी ने धीरे से अपनी सुंदर, बड़ी, पीली पंखुड़ियाँ फैला ली हो । भागती - दौड़ती जिन्दगी और वातानुकूलित कमरों के बाहर जाड़े की धूप में बैठ ऐसा लगा जैसे बरसों से चैन की नींद सोए नहीं; पुकारने लगी सुहानी धूप अपनी गोद में सुलाने को । जाड़े की धूप जैसे ममता का आँचल । - सीमा कुमार ६ जनवरी, २००७, गुड़गाँव ।

शुभकामनाएँ

शुभकामनाएँ मेरी - नव वर्ष के नव प्रभात में आशा का स्वर्णिम प्रभाकर फैला जाए उल्लास प्रभा । शोभायमान हो जाए धरती उस प्रभाकर की कांति से । काली, अंधियारी, नीरव निशा का अंश मात्र भी रहे न बाकी जब आए प्रत्यूष मनोहर । इस नूतन वर्ष में कभी गति अवरूद्ध न हो जीवन की; जीवन - केवल धमनियों में रक्त और ह्रुदय में श्वास का ही नहीं जीवन कर्म और कर्तव्य का भी, उद्दम और उत्साह का भी । स्वर लेकर नए यह वर्ष नवीन आए । अंत: करण में संगीत जगे, हर शैल शिखर में गीत जगे, और धरा के कण-कण में सभी के लिए अनुराग जगे ; नव वर्ष के नव प्रभात में आशा के संग सारा संसार जगे । - सीमा (लिखित : ५ दिसम्बर, १९९७)