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फ़रवरी, 2007 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रकृति की सुन्दरता फूलों से | स्क्रीन सेवर बनाएं और आनंद लें

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प्रकृति की सुन्दरता फूलों से | स्क्रीन सेवर बनाएं और आनंद लें | 

प्यार

प्यार अंधेरे में टिमटिमाती हुई एक रोशनी है जो इंसान को अंधेरे से कभी हारने नहीं देती । सीमा १० जुलाई, १९९९ इसे 'कृत्या' पर पढ़ें

रायबरेली में निफ्ट

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http://niftindia.com/downloads/NIFT%20ADVT.pdf निफ्ट की स्थापना १९८६ में भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के अंतर्गत दिल्ली में किया गया था । निफ्ट की इन परिसरों में - दिल्ली , बँगलौर , चेन्नई , गाँधीनगर , हैदराबाद , कोलकाता और मुंबई , अब रायबरेली भी जुड़ने जा रहा है । रायबरेली में निफ्ट की आज शुरूआत - यहाँ देखें ।

निफ्ट से परिचय और सफ़र की शुरूआत

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चिठ्ठों की नई श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए यहाँ लिख रही हूँ । जब मैंने १९९५ में शब्द-जाल लिखा था तब कदापि यह सोच कर नहीं लिखा था कि कुछ ही दिनों में मैं वास्तविक ताने-बाने, सूत और कपड़े के बारे में पढ़ूँगी और वही मेरा व्यवसाय और कार्य-क्षेत्र हो जाएगा । शब्द-जाल पर प्रियंकर जी की टिप्पणी है : "कविता से यह प्रकट होता है कि रचनाकार का संबंध फ़ैशन टेक्नोलॉजी से है. आखिर कबीर की रचनाओं में भी तो ताना-बाना जैसे शब्द और चदरिया बुनने के प्रसंग आते हैं." जब शब्द-जाल लिखा था तब फ़ैशन टेक्नोलॉजी से कोई संबंध नहीं था और न अधिक जानकारी थी थी इस क्षेत्र के बारे में । यह इस क्षेत्र में आने से पहले लिखा था । संयोग कह लीजिए या कुछ और .. दरसल +२ में मैंने विज्ञान विषय पढ़े थे । आम धारणा यह थी कि अगर कोई अपनी पढा़ई और भविष्य के प्रति जागरूक है तो वह या तो अभियंता बनेगा या चिकित्सक .. और कोशिश मेरी भी उसी तरफ थी, चाहे रूचि न भी थी । पर +२ के उन दो सालों में लगा मेरा रूझान कला की तरफ है और मैंने अपने मन की बात सुनने का निर्णय लिया । स्नातक के विषय थे चित्रकला (विशेष) और अंग्रेजी साहित्य तथा दोनों म...

मुठ्ठी भर मीठी रौशनी

तुम्हारे मौन ने कही थी कहानी । सुना था मैंने अनगिनत, मीठे गीत, इन्हीं आँखों की जुबानी । एक मीठा सा एहसास भी था जिसे मैंने मुठ्ठी में बंद कर समेट लेने की कोशिश भी की थी । पर जान गई हूँ एहसास मुठ्ठी में बंद नहीं हुआ करते । रौशनी के तरह बस उजाला फैला जाते हैं जैसे आज भी फैला है तुमसे मेरे जीवन में । - सीमा कुमार ६ फरवरी, २००७ (शादी की सालगिरह पर ।)

'मेरी कृति' और हिन्दी चिठ्ठाकारी का एक साल

जब मैंने अपना पहला हिन्दी चिठ्ठा लिखा था - और भी हैं रास्ते और कहा था : फिर से राहें कहती हैं आओ, कदम बढाओ, पाने को मंजिलें अभी और भी हैं / मंजिलें जो हासिल हैं वहाँ से शुरू होते नई मंजिलों की ओर रास्ते अभी और भी हैं / वास्तव में मैं कुछ नए रास्तों की ओर बढ़ रही थी .. मंजिलें तो अब भी मिली नहीं हैं पर सफर अब भी जारी है । चिठ्ठाकारी भी एक नया सफर था । वैसे तो मैं चिठ्ठाकारी के एक साल होने पर यहाँ लिख चुकी हूँ मेरे अंग्रेजी चिठ्ठे पर । पर मैं फिर आज यहाँ खासकर धन्यवाद देना चहूँगी रवि कामदार का जिन्होंने हिन्दी चिठ्ठा शुरु करने में कफी मदद की और अनूप भार्गव जी का जिन्होंने मुझे हिन्दी लिखना सीखने और बरहा को लेकर काफी मदद की । इनके अलावा उन सभी का जो मेरी कृति को पढ़ने आते रहे और मेरा उत्साह बढ़ाते रहे । मेरी कृति की शुरुआत मैंने कविताओं के लिए की थी पर अब गद्य भी लिखना शुरु कर दिया है । कविताओं को मैं अब भी अलग रखना चहती हूँ । उसके लिए आज ही से एक नया चिठ्ठा शुरु कर रही हूँ - शब्द-जाल ... The Web of Words [ http://seemaspoems.blogspot.com/ ] नहीं, यह नया चिठ्ठा नहीं है जहाँ मैं कुछ...