ज़िन्दगी कभी-कभी कहीं खत्म सी हो जाती है, कहीं थम सी जाती है और फिर कहीं शुरू हो जाती है / कहीं उमड़ जाती है कहीं मचल जाती है कहीं रेत के बवन्डरों सी उड़ती चली जाती है / कहीं हरे-हरे पत्तों पर पडी़ बरखा की बूँदों सी झिलमिलाती जाती है / कहीं ठंढी हवाओं सी बस छू कर चली जाती है / यूँ ही बदलती रूप रंग ज़िन्दगी चली जाती है / थाम ले जिस पल को वही बस अपना है ; बाकी की ज़िन्दगी रेत-सी यूँ ही फिसल जाती है / - सीमा १४ अप्रैल, २००४. सि.