19.7.07

पराग और पंखुड़ियाँ

पराग और पंखुड़ियाँ मैंने जून माह की यूनिकवि प्रतियोगिता के लिए भेजी थी । कविता ८वें पायदान पर रही और पुरस्कार- कवि कुलवंत सिंह की ओर से उनकी काव्य-पुस्तक 'निकुंज' की स्वहस्ताक्षरित प्रति जिसका मुझे इंतजार है ।

इस कविता में 'अरहुल' शब्द का प्रयोग गुड़हल के फूल के लिए किया गया है । जहाँ मैं पली-बढी़ वहाँ 'अरहुल' का प्रयोग आम भाषा में किया जाता था.. इसीलिए मैंने 'अरहुल' का ही प्रयोग किया है ।
पराग और पंखुड़ियाँ मेरे +२ के दिनों की लिखी हुई है ।


सुनील डोगरा ज़ालिम ने टिप्पणी दी है "वैसे अरहुल के फूल कॊ देखने की इच्छा हॊ रही है काश आपने चित्र दिया हॊता।"

हिन्द-युग्म पर तो नहीं लगा पाई, पर यहाँ लगा रही हूँ । यह श्याम-श्वेत 'लीनो-कट ग्रफिक प्रिंट' मेरे स्नातक के समय की मेरी कृति है जिसमें अरहुल (गुड़हल) को दिखाया गया है ।

कृति: सीमा कुमार, १९९७

6 comments:

गिरिराज जोशी "कविराज" said...

बहुत ही खूबसूरत कृति!!!

मैं भी अरहुल के फूल के दर्शन पहली बार कर रहा हूँ, बहुत ही खूबसूरत लग रहा है आपकी कृति में।

सस्नेह,

- गिरिराज जोशी "कविराज"

Sanjeeva Tiwari said...

धन्‍यवाद सीमा

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर कृति है।पहली बार देखा है।

शब्द-सृष्टी said...

सीमाजी,
बधाई.
आपका रेखांकन भी सुंदर है और कविता भी.ज़िन्दगी की आपाधापी में ज़माने भर की ज़िल्लतें प्रकृति की कविताओं को पास आने ही नहीं देती ...आपके साथ कुदरत का सहज साथ नज़र आया ...बधाई.
शब्द के साथ पर्यावरण से भी नज़दीकी बनी रहे आपकी .....
यही दुआ.

जोगलिखी संजय पटेल की said...

आपकी कविता में प्रकृति की उपस्थिति मन को छूती है.नये सम्मान के लिये बधाई.आपके हाथ का बना चित्र भी सुंदर बन पड़ा है.ईश्वर आपको निसर्ग का साथ हमेशा देता रहे..कुदरत की कृतियों की उपस्थिति कविता में कम होती जा रही है; उस पर अडिग रहें.

Udan Tashtari said...

अरहुल के फूल के दर्शन हो गये. कविता हम पढ़ चुके हैं हिन्द युग्म पर.