जब मैं कहती हूँ
देखना, एक दिन ऐसा होगा;
देखना, एक दिन वैसा होगा
तो लोग कहते हैं
कब होगा ?
कैसे होगा ?
मैं कहती हूँ
देखना, एक दिन
सागर मेरी बाँहों में होगा,
फूल मेरी राहों में,
और शिलाखंड मेरी राह के
पुष्प बन जाएँगे ।
देखना, एक दिन
मैं सूरज की लपटों को
छू लूँगी,
अंतरिक्ष की गहराइयों में जाकर
रहस्यों को खोज लाऊँगी ।
देखना, एक दिन
मेरे सारे सपने सच होंगे,
सभी मेरे अपने होंगे ;
न कोई वेदना होगी,
न निराशा,
न पछतावा,
न संर्घष,
न पराजय ।
जब मैं कहती हूँ
देखना, एक दिन ऐसा होगा ;
देखना, एक दिन वैसा होगा
तो लोग मुझे
अविश्वास से देखते हैं,
मुझे विक्षिप्त समझते हैं ।
चाँद को पाने के लिए
मचलने वाला बच्चा
क्या अपनी जिद से
चाँद को पा लेता है ?
परंतु
आशा, विश्वास
और उत्साह से भरी मैं
आँखों में हजारों सपने लिए
अब भी कहती हूँ
देखना, एक दिन ऐसा होगा ;
देखना, एक दिन वैसा होगा,
देखना, एक दिन ... ।
–सीमा
9 जनवरी, 1997
24.4.06
13.4.06
जीवन तो बस जीवन है
जीवन क्या है ?
अमृत का प्याला नहीं
काँटों की माला नहीं,
कष्टों की ज्वाला नहीं,
उल्लास की शाला नहीं,
जीवन तो बस जीवन है ।
आँसू की कुछ बूँदें,
हँसी की कुछ फुहारें,
गीतों का संग्रह,
कभी धीमे, तो कभी तेज
बाजीगरों का करतब,
जीवन तो बस जीवन है ।
सीमा
५ दिसम्बर, १९९६
ब. व.
अमृत का प्याला नहीं
काँटों की माला नहीं,
कष्टों की ज्वाला नहीं,
उल्लास की शाला नहीं,
जीवन तो बस जीवन है ।
आँसू की कुछ बूँदें,
हँसी की कुछ फुहारें,
गीतों का संग्रह,
कभी धीमे, तो कभी तेज
बाजीगरों का करतब,
जीवन तो बस जीवन है ।
सीमा
५ दिसम्बर, १९९६
ब. व.
30.3.06
ठहर जाना
ठहरे हुए लम्हों में
अरमानों का ठहर जाना;
तनहाई में, बेबसी में
आँसुओं का ठहर जाना;
कैसा इत्तफाक है
ग़मगीन लम्हों में
दिल के किसी कोनें में ही
गमों का ठहर जाना ।
सीमा
१४ अप्रैल, १९९६
अरमानों का ठहर जाना;
तनहाई में, बेबसी में
आँसुओं का ठहर जाना;
कैसा इत्तफाक है
ग़मगीन लम्हों में
दिल के किसी कोनें में ही
गमों का ठहर जाना ।
सीमा
१४ अप्रैल, १९९६
24.3.06
सन्नाटा
सन्नाटे की बात पर कुछ पंक्तियाँ और भी :-
सन्नाटे को
कर लूँ बंद
मैं मुठ्ठी में
बार - बार क्यों
ऐसी ख्वाहिश होती है ?
अन्धकार पर
कर लूँ कब्जा
मन की क्यों
ऐसी कोशिश होती है ?
- सीमा
१७/०२/०३, दि.
सन्नाटे को
कर लूँ बंद
मैं मुठ्ठी में
बार - बार क्यों
ऐसी ख्वाहिश होती है ?
अन्धकार पर
कर लूँ कब्जा
मन की क्यों
ऐसी कोशिश होती है ?
- सीमा
१७/०२/०३, दि.
22.3.06
सन्नाटे की आवाज
सन्नाटे की भी
अपनी एक आवाज होती है
जो बिना बोले भी
बहुत कुछ बोलती है,
पूछती है,
फुसफुसाती है,
गुनगुनाती है ।
अपने दोनों कानों को
दोनों हाथों से
बंद कर लो,
कुछ मत बोलो
और सुनो
सन्नाटे की सरसराहाट,
सन्नाटे की गूँज,
सन्नाटे की चीख ।
क्या अब भी
विश्वास नहीं होता
कि सन्नाटे की भी
अपनी एक आवाज होती है ?
- सीमा
१४ मई, १९९७
चा.
अपनी एक आवाज होती है
जो बिना बोले भी
बहुत कुछ बोलती है,
पूछती है,
फुसफुसाती है,
गुनगुनाती है ।
अपने दोनों कानों को
दोनों हाथों से
बंद कर लो,
कुछ मत बोलो
और सुनो
सन्नाटे की सरसराहाट,
सन्नाटे की गूँज,
सन्नाटे की चीख ।
क्या अब भी
विश्वास नहीं होता
कि सन्नाटे की भी
अपनी एक आवाज होती है ?
- सीमा
१४ मई, १९९७
चा.
7.3.06
होली की शाम
होली के रंगों की शाम,
उमंगों की शाम,
तरंगों की शाम /
याद आ रही है मुझे
अपने गाँव की
होली की शाम /
'होरी' गाती
गावँ के मर्दों की
टोली की शाम /
हर एक चेहरे पर
गुलाल से सजी
रंगोली की शाम /
गुलाल से गुलाबी करने
घर आती
हर सखी-सहेली की शाम /
रंगे हुए चेहेरे को
घूँघट के पीछे छुपाती
दुल्हन नई-नवेली की शाम /
बहारों की शाम,
फुहारों की शाम,
मस्ती की शाम,
सुस्ती की शाम /
याद आ रही है मुझे
अपने गाँव की
होली की शाम /
- सीमा
२३ मार्च, १९९७, ब.व.
(होलिका-दहन)
उमंगों की शाम,
तरंगों की शाम /
याद आ रही है मुझे
अपने गाँव की
होली की शाम /
'होरी' गाती
गावँ के मर्दों की
टोली की शाम /
हर एक चेहरे पर
गुलाल से सजी
रंगोली की शाम /
गुलाल से गुलाबी करने
घर आती
हर सखी-सहेली की शाम /
रंगे हुए चेहेरे को
घूँघट के पीछे छुपाती
दुल्हन नई-नवेली की शाम /
बहारों की शाम,
फुहारों की शाम,
मस्ती की शाम,
सुस्ती की शाम /
याद आ रही है मुझे
अपने गाँव की
होली की शाम /
- सीमा
२३ मार्च, १९९७, ब.व.
(होलिका-दहन)
1.3.06
रिश्ता
तुम्हारे और मेरे बीच
आँसुओं का रिश्ता है,
दर्द की एक डोर है
जो बाँधे हुए है
हम दोनों को /
दर्द से सभी डरते हैं,
सभी दूर भागते हैं
फिर भी
जाने क्यों
यही दर्द,
यही पीडा
हम दोनों को
जोडे हुए है
एक दूसरे से,
इस समस्त सृष्टी से /
आपस में
छोटे-छोटे दर्द बाँटकर
यह डोर और मजबूत हो जाती है
पर
दर्द से सभी डरते हैं
शायद तुम भी
और मैं भी
तभी आपस में
दर्द का बाँटना
कम होता गया
और हमारे बीच की डोर
हमारे बीच के
फासले को नापती हुई
ज्यों की त्यों
तनी हुई है /
-सीमा
१९ दिसम्बर, १९९६
ब.व.
आँसुओं का रिश्ता है,
दर्द की एक डोर है
जो बाँधे हुए है
हम दोनों को /
दर्द से सभी डरते हैं,
सभी दूर भागते हैं
फिर भी
जाने क्यों
यही दर्द,
यही पीडा
हम दोनों को
जोडे हुए है
एक दूसरे से,
इस समस्त सृष्टी से /
आपस में
छोटे-छोटे दर्द बाँटकर
यह डोर और मजबूत हो जाती है
पर
दर्द से सभी डरते हैं
शायद तुम भी
और मैं भी
तभी आपस में
दर्द का बाँटना
कम होता गया
और हमारे बीच की डोर
हमारे बीच के
फासले को नापती हुई
ज्यों की त्यों
तनी हुई है /
-सीमा
१९ दिसम्बर, १९९६
ब.व.
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