सपनीली आँखों को
सोने मत देना ।
एहसासों की नदियों को
कल्पना की नहरों को
इस दुनियाँ के सागर में
जीवन के झमेलों में
रंग - बिरंगे मेलों में
संघर्ष के खेलों में
खोने मत देना ।
सपनीली आँखों को
सोने मत देना ।
-सीमा
९ जनवरी, १९९७
30.6.06
18.5.06
दर्द
ज़िन्दगी एक दर्द है ।
कभी न खत्म होने वाला,
अनंत तक
चलते चले जाने वाला
दर्द ।
हर खुशी
एक दर्द है -
दो पल में
खुशी खत्म हो जाने का दर्द ।
मिलन भी
एक दर्द है -
मिलकर बिछड़ जाने का दर्द ।
प्रेम भी एक दर्द है -
अपने प्रिय में
लीन न हो पाने का दर्द,
एक आत्मा होकर भी
दो अलग अस्तित्व
होने का दर्द,
अपने प्रिय के दर्द को
न ले पाने का दर्द ।
हर साँस
एक दर्द है -
हर साँस के साथ
ज़न्दगी के हर दर्द को
जीते रहने का दर्द ।
ज़िन्दगी एक प्यास है -
प्यास स्नेह की,
अपनापन की,
खुशी की,
अपनों को खुशी देने की,
दर्द के समापन की,
हर प्यास,
हर दर्द से दूर
अनंत में
कहीं विलीन हो जाने की ।
सीमा
२ नवम्बर, २०००
कभी न खत्म होने वाला,
अनंत तक
चलते चले जाने वाला
दर्द ।
हर खुशी
एक दर्द है -
दो पल में
खुशी खत्म हो जाने का दर्द ।
मिलन भी
एक दर्द है -
मिलकर बिछड़ जाने का दर्द ।
प्रेम भी एक दर्द है -
अपने प्रिय में
लीन न हो पाने का दर्द,
एक आत्मा होकर भी
दो अलग अस्तित्व
होने का दर्द,
अपने प्रिय के दर्द को
न ले पाने का दर्द ।
हर साँस
एक दर्द है -
हर साँस के साथ
ज़न्दगी के हर दर्द को
जीते रहने का दर्द ।
ज़िन्दगी एक प्यास है -
प्यास स्नेह की,
अपनापन की,
खुशी की,
अपनों को खुशी देने की,
दर्द के समापन की,
हर प्यास,
हर दर्द से दूर
अनंत में
कहीं विलीन हो जाने की ।
सीमा
२ नवम्बर, २०००
2.5.06
24.4.06
देखना एक दिन
जब मैं कहती हूँ
देखना, एक दिन ऐसा होगा;
देखना, एक दिन वैसा होगा
तो लोग कहते हैं
कब होगा ?
कैसे होगा ?
मैं कहती हूँ
देखना, एक दिन
सागर मेरी बाँहों में होगा,
फूल मेरी राहों में,
और शिलाखंड मेरी राह के
पुष्प बन जाएँगे ।
देखना, एक दिन
मैं सूरज की लपटों को
छू लूँगी,
अंतरिक्ष की गहराइयों में जाकर
रहस्यों को खोज लाऊँगी ।
देखना, एक दिन
मेरे सारे सपने सच होंगे,
सभी मेरे अपने होंगे ;
न कोई वेदना होगी,
न निराशा,
न पछतावा,
न संर्घष,
न पराजय ।
जब मैं कहती हूँ
देखना, एक दिन ऐसा होगा ;
देखना, एक दिन वैसा होगा
तो लोग मुझे
अविश्वास से देखते हैं,
मुझे विक्षिप्त समझते हैं ।
चाँद को पाने के लिए
मचलने वाला बच्चा
क्या अपनी जिद से
चाँद को पा लेता है ?
परंतु
आशा, विश्वास
और उत्साह से भरी मैं
आँखों में हजारों सपने लिए
अब भी कहती हूँ
देखना, एक दिन ऐसा होगा ;
देखना, एक दिन वैसा होगा,
देखना, एक दिन ... ।
–सीमा
9 जनवरी, 1997
देखना, एक दिन ऐसा होगा;
देखना, एक दिन वैसा होगा
तो लोग कहते हैं
कब होगा ?
कैसे होगा ?
मैं कहती हूँ
देखना, एक दिन
सागर मेरी बाँहों में होगा,
फूल मेरी राहों में,
और शिलाखंड मेरी राह के
पुष्प बन जाएँगे ।
देखना, एक दिन
मैं सूरज की लपटों को
छू लूँगी,
अंतरिक्ष की गहराइयों में जाकर
रहस्यों को खोज लाऊँगी ।
देखना, एक दिन
मेरे सारे सपने सच होंगे,
सभी मेरे अपने होंगे ;
न कोई वेदना होगी,
न निराशा,
न पछतावा,
न संर्घष,
न पराजय ।
जब मैं कहती हूँ
देखना, एक दिन ऐसा होगा ;
देखना, एक दिन वैसा होगा
तो लोग मुझे
अविश्वास से देखते हैं,
मुझे विक्षिप्त समझते हैं ।
चाँद को पाने के लिए
मचलने वाला बच्चा
क्या अपनी जिद से
चाँद को पा लेता है ?
परंतु
आशा, विश्वास
और उत्साह से भरी मैं
आँखों में हजारों सपने लिए
अब भी कहती हूँ
देखना, एक दिन ऐसा होगा ;
देखना, एक दिन वैसा होगा,
देखना, एक दिन ... ।
–सीमा
9 जनवरी, 1997
13.4.06
जीवन तो बस जीवन है
जीवन क्या है ?
अमृत का प्याला नहीं
काँटों की माला नहीं,
कष्टों की ज्वाला नहीं,
उल्लास की शाला नहीं,
जीवन तो बस जीवन है ।
आँसू की कुछ बूँदें,
हँसी की कुछ फुहारें,
गीतों का संग्रह,
कभी धीमे, तो कभी तेज
बाजीगरों का करतब,
जीवन तो बस जीवन है ।
सीमा
५ दिसम्बर, १९९६
ब. व.
अमृत का प्याला नहीं
काँटों की माला नहीं,
कष्टों की ज्वाला नहीं,
उल्लास की शाला नहीं,
जीवन तो बस जीवन है ।
आँसू की कुछ बूँदें,
हँसी की कुछ फुहारें,
गीतों का संग्रह,
कभी धीमे, तो कभी तेज
बाजीगरों का करतब,
जीवन तो बस जीवन है ।
सीमा
५ दिसम्बर, १९९६
ब. व.
30.3.06
ठहर जाना
ठहरे हुए लम्हों में
अरमानों का ठहर जाना;
तनहाई में, बेबसी में
आँसुओं का ठहर जाना;
कैसा इत्तफाक है
ग़मगीन लम्हों में
दिल के किसी कोनें में ही
गमों का ठहर जाना ।
सीमा
१४ अप्रैल, १९९६
अरमानों का ठहर जाना;
तनहाई में, बेबसी में
आँसुओं का ठहर जाना;
कैसा इत्तफाक है
ग़मगीन लम्हों में
दिल के किसी कोनें में ही
गमों का ठहर जाना ।
सीमा
१४ अप्रैल, १९९६
24.3.06
सन्नाटा
सन्नाटे की बात पर कुछ पंक्तियाँ और भी :-
सन्नाटे को
कर लूँ बंद
मैं मुठ्ठी में
बार - बार क्यों
ऐसी ख्वाहिश होती है ?
अन्धकार पर
कर लूँ कब्जा
मन की क्यों
ऐसी कोशिश होती है ?
- सीमा
१७/०२/०३, दि.
सन्नाटे को
कर लूँ बंद
मैं मुठ्ठी में
बार - बार क्यों
ऐसी ख्वाहिश होती है ?
अन्धकार पर
कर लूँ कब्जा
मन की क्यों
ऐसी कोशिश होती है ?
- सीमा
१७/०२/०३, दि.
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