एक पल
जो मेरा है,
एक पल
जो तुम्हारा है,
आओ मिल कर
बाँट लें ।
फिर हम दोनों के
दो – दो पल हो जाएँगे
साथ – साथ ।
– सीमा
11 जून, 1998
4.9.06
24.8.06
बादल
बादल का एक टुकड़ा आसमान में आकर
मेरी आँखों में अनंत आशाएँ दे गया
तो क्या हुआ जो बादल नहीं, बस आँखें बरसीं
- सीमा कुमार
२४ अगस्त '०६
मेरी आँखों में अनंत आशाएँ दे गया
तो क्या हुआ जो बादल नहीं, बस आँखें बरसीं
- सीमा कुमार
२४ अगस्त '०६
11.8.06
एक और त्रिवेणी
विषय : गुरूर
एहसास तक नहीं था मुझे अपने होने का
नाज़ तुम्हारे साथ होने का जरूर था
तुम मेरे हुए, अपने आप पर गुरूर आ गया
सीमा
१२ अगस्त '०६
एहसास तक नहीं था मुझे अपने होने का
नाज़ तुम्हारे साथ होने का जरूर था
तुम मेरे हुए, अपने आप पर गुरूर आ गया
सीमा
१२ अगस्त '०६
8.8.06
त्रिवेणी
Orkut गुलज़ार ग्रुप पर लिखी 'त्रिवेणी'
विषय : नींद
नींद से बोझिल आँखें
आँखों में एक ख्वाब
ख्वाबों का है सिलसिला, सच भी ख्वाब सा लगता है
- सीमा कुमार
२३ मई २००६
**************************
विषय (आखिरी पंक्ति के लिये) : धुआँ मेरी आँखों में आग का नहीं
आँच बहुत है चूल्हे में रोटियों के लिए मगर
लाल आँखें देख आग का प्रतिबिंब मत समझना
धुआँ मेरी आँखों में आग का नहीं !
- सीमा कुमार
८ अगस्त २००६
विषय : नींद
नींद से बोझिल आँखें
आँखों में एक ख्वाब
ख्वाबों का है सिलसिला, सच भी ख्वाब सा लगता है
- सीमा कुमार
२३ मई २००६
**************************
विषय (आखिरी पंक्ति के लिये) : धुआँ मेरी आँखों में आग का नहीं
आँच बहुत है चूल्हे में रोटियों के लिए मगर
लाल आँखें देख आग का प्रतिबिंब मत समझना
धुआँ मेरी आँखों में आग का नहीं !
- सीमा कुमार
८ अगस्त २००६
25.7.06
मेरे अंदर के मानव
मैं एक मानव हूँ
पर मेरे अंदर
कई और मानव हैं
– अनगिनत, अनदेखे मानव
जो छिपे रहते हैं मेरे अंदर ।
क्रोध, विनय, विचार,
संवेदना, बुद्धि, आत्म-सम्मान,
जैसे कितने ही नाम हैं उनके ।
समय-समय पर
अलग-अलग मानव
मेरे इस बाहरी मानव पर
हावी होते रहते हैं ।
कभी किसी एक की अह्मियत
बढ़ जाती है
तो बाकी सभी की अह्मियत
नगण्य हो जाती है ।
इसी प्रकार सभी की अह्मियत
सभी का प्रभाव
बारी-बारी से
घटता-बढ़ता रहता है ।
ये सभी भीतरी मानव
मिलकर बनाते हैं
मेरे बाहरी मानव को; मुझको …
पर दुनिया केवल मुझे देखती है-
मेरे बाहरी मानव को …
और मेरे अंदर के मानव
रह जाते हैं छिपे मेरे अंदर ।
इन सब पर
मेरे बाहरी मानव का रूप
र्निभर करता है;
ये सभी नींव की ईंट बने रह जाते हैं
जिन पर मेरे बाहरी मानव की
मजबूती तो र्निभर करती है
पर वो ख़ुद
दुनिया की आँखों से
रह जाते हैं अनदेखे …
अनजाने ... ।
–सीमा
2 जून, 1993
पर मेरे अंदर
कई और मानव हैं
– अनगिनत, अनदेखे मानव
जो छिपे रहते हैं मेरे अंदर ।
क्रोध, विनय, विचार,
संवेदना, बुद्धि, आत्म-सम्मान,
जैसे कितने ही नाम हैं उनके ।
समय-समय पर
अलग-अलग मानव
मेरे इस बाहरी मानव पर
हावी होते रहते हैं ।
कभी किसी एक की अह्मियत
बढ़ जाती है
तो बाकी सभी की अह्मियत
नगण्य हो जाती है ।
इसी प्रकार सभी की अह्मियत
सभी का प्रभाव
बारी-बारी से
घटता-बढ़ता रहता है ।
ये सभी भीतरी मानव
मिलकर बनाते हैं
मेरे बाहरी मानव को; मुझको …
पर दुनिया केवल मुझे देखती है-
मेरे बाहरी मानव को …
और मेरे अंदर के मानव
रह जाते हैं छिपे मेरे अंदर ।
इन सब पर
मेरे बाहरी मानव का रूप
र्निभर करता है;
ये सभी नींव की ईंट बने रह जाते हैं
जिन पर मेरे बाहरी मानव की
मजबूती तो र्निभर करती है
पर वो ख़ुद
दुनिया की आँखों से
रह जाते हैं अनदेखे …
अनजाने ... ।
–सीमा
2 जून, 1993
30.6.06
सोने मत देना
सपनीली आँखों को
सोने मत देना ।
एहसासों की नदियों को
कल्पना की नहरों को
इस दुनियाँ के सागर में
जीवन के झमेलों में
रंग - बिरंगे मेलों में
संघर्ष के खेलों में
खोने मत देना ।
सपनीली आँखों को
सोने मत देना ।
-सीमा
९ जनवरी, १९९७
सोने मत देना ।
एहसासों की नदियों को
कल्पना की नहरों को
इस दुनियाँ के सागर में
जीवन के झमेलों में
रंग - बिरंगे मेलों में
संघर्ष के खेलों में
खोने मत देना ।
सपनीली आँखों को
सोने मत देना ।
-सीमा
९ जनवरी, १९९७
18.5.06
दर्द
ज़िन्दगी एक दर्द है ।
कभी न खत्म होने वाला,
अनंत तक
चलते चले जाने वाला
दर्द ।
हर खुशी
एक दर्द है -
दो पल में
खुशी खत्म हो जाने का दर्द ।
मिलन भी
एक दर्द है -
मिलकर बिछड़ जाने का दर्द ।
प्रेम भी एक दर्द है -
अपने प्रिय में
लीन न हो पाने का दर्द,
एक आत्मा होकर भी
दो अलग अस्तित्व
होने का दर्द,
अपने प्रिय के दर्द को
न ले पाने का दर्द ।
हर साँस
एक दर्द है -
हर साँस के साथ
ज़न्दगी के हर दर्द को
जीते रहने का दर्द ।
ज़िन्दगी एक प्यास है -
प्यास स्नेह की,
अपनापन की,
खुशी की,
अपनों को खुशी देने की,
दर्द के समापन की,
हर प्यास,
हर दर्द से दूर
अनंत में
कहीं विलीन हो जाने की ।
सीमा
२ नवम्बर, २०००
कभी न खत्म होने वाला,
अनंत तक
चलते चले जाने वाला
दर्द ।
हर खुशी
एक दर्द है -
दो पल में
खुशी खत्म हो जाने का दर्द ।
मिलन भी
एक दर्द है -
मिलकर बिछड़ जाने का दर्द ।
प्रेम भी एक दर्द है -
अपने प्रिय में
लीन न हो पाने का दर्द,
एक आत्मा होकर भी
दो अलग अस्तित्व
होने का दर्द,
अपने प्रिय के दर्द को
न ले पाने का दर्द ।
हर साँस
एक दर्द है -
हर साँस के साथ
ज़न्दगी के हर दर्द को
जीते रहने का दर्द ।
ज़िन्दगी एक प्यास है -
प्यास स्नेह की,
अपनापन की,
खुशी की,
अपनों को खुशी देने की,
दर्द के समापन की,
हर प्यास,
हर दर्द से दूर
अनंत में
कहीं विलीन हो जाने की ।
सीमा
२ नवम्बर, २०००
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
प्रकृति और पंक्षियों को अर्पित मेरी कृति
प्रकृति और पंक्षियों को अर्पित - वस्त्रों ( टी-शर्ट्स ) के लिए मेरी कृति : वीडियो - प्रकृति और पंक्षियों से प्रेरित डिज़ाइन: और पढ़ें ... फ...
-
कविता संग्रह ‘पराग और पंखुड़ियाँ’ अब फ्लिपकार्ट और इन्फीबीम पर उपलब्ध मेरी कविता संग्रह ‘पराग और पंखुड़ियाँ’ अब फ्लिपक...
-
प्रकृति और पंक्षियों को अर्पित - वस्त्रों ( टी-शर्ट्स ) के लिए मेरी कृति : वीडियो - प्रकृति और पंक्षियों से प्रेरित डिज़ाइन: और पढ़ें ... फ...
-
कविता - शब्दों का ताना-बाना, शब्दों का जाल । कल्पना के हथकरघे पर अक्षर - अक्षर से शब्दों के सूत कात, जुलाहा बन शब्दों के सूत से वाक्यों का क...