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प्रकृति की सुन्दरता फूलों से | स्क्रीन सेवर बनाएं और आनंद लें

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प्रकृति की सुन्दरता फूलों से | स्क्रीन सेवर बनाएं और आनंद लें | 

नन्हा सा पल

हिन्द-युग्म पर नन्हा सा पल : मेरे एक पल ने आज फिर मुझसे कहा है मैं तुम्हासरे संग अपना वह नन्हा सा पल बाँट लूँ जो अब तक बस मेरा होकर रहा है । वह पल जिसमें सिर्फ मैं हूँ, वह नन्हें कण सा नन्हा पल .... [ पूरा पढ़ें ]

बाल उद्यान पर 'भोला बचपन' और 'दुर्गा-पूजा की सैर'

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बाल उद्यान पर : कीजिये दुर्गा-पूजा की सैर याद कीजिये अपना भोला बचपन

कविता

आज सुबह-सुबह हिन्द-युग्म पर कविता पोस्ट करना था और मैं अपनी डायरी भूल आई थी घर पर । सोचा कुछ नया लिखूँ तो एकदम से माँ की याद आई और यह कविता लिखी - उड़ान । अधिक विश्लेशण नहीं किया, इसलिए कमियों को माफ कीजिएगा । यह कविता उड़ान मेरी माँ को समर्पित है । एक मित्र, जिसे हिन्दी पूरी तरह समझ नहीं आती, ने इस कविता का मतलब पूछा .. और अर्थ बताते-बताते इसे अंग्रेज़ी में अनुवाद कर दिया जो यहाँ पढ़ सकते है । एक बार हर लम्हा एक विस्मय लिखा था अंग्रेज़ी में (Each Moment is a Wonder ) और अनुवाद था हिन्दी में । इस बार हिन्दी में लिखकर अंग्रेज़ी में अनुवाद किया । आप भी पढ़कर बताइए ये दोनों प्रयास कैसे रहे ।

नन्हें खिलाड़ी :)

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वैसे तो यह तस्वीरें मैं यहाँ प्रकाशित कर चुकी हूँ पर २०-२० वर्ल्ड कप जीतने के बाद मेरा फिर से यहाँ प्रकाशित करने का मन किया । बल्ला उठे या न उठे, ये खेलने को तैयार हैं .. तो आप भी इन नन्हें खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाएँ ।

नई प्रविष्टियाँ

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यह रही मेरी बिटिया जो माँ के लिए रोटियाँ बना रही है - और देखिए बाल-उद्यान पर । और यह कुछ पंक्तियाँ यूँ ही बैठे - बैठे .. कुछ गलतियाँ भी रह गई हैं ।

विकास कुमार की आवाज़ में मेरी कविता 'अंतर्द्वन्द्व'

मेरी कविता अंतर्द्वन्द्व अब विकास कुमार की आवाज़ में यहाँ सुने । इसके पहले मेरी कविता हर लम्हा एक विस्मय भी आई थी विकास कुमार की आवाज में । धन्यवाद विकास :)

मेरी कुछ रचनाएँ-- 'हिन्द-युग्म' और 'बाल-उद्यान' पर

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बहुत दिन हो गए मुझे यहाँ कुछ लिखे । घर में एक-एक कर सभी को बुखार, आफिस और साथ ही अन्य व्यस्तताएँ.. कि सोचती ही रह गई फुर्सत से लिखूँगी । 'फुर्सत' सोचने की भी फुर्सत नहीं मिलती !! पर मैं लिखती रही हूँ नियमित रूप से कुछ सामूहिक प्रायासों में जो नीचे हैं.. अपनी मूल्यवान राय और टिप्पणियाँ अवश्य दीजिएगा उन्हें पढ़कर । मेरी कुछ कविताएँ ' हिन्द-युग्म ' पर पर पढ़ी जा सकती हैं : # अंतर्द्वन्द्व - एक नई कविता.. रोज़ जलाती हूँ खुद को रोज़ प्रज्वलित होती है एक आग इस आशा में - स्वयं के ही हवन कुंड में स्वाहा हो जाऊँ और उस राख से पुनर्निमित हो निकल आऊँ निर्मल मैं फीनिक्स की तरह ... [पूरा पढें] # नींद, डर और आँसू - नींद, डर और आँसू पर अलग-अलग कुछ पंक्तियाँ आँसू .... जज़्बात का दरिया है … जो छलक गई बूँदें तो एक-एक बूँद एक तेज़ धार बन जाएगी और हर बाँध निरर्थक .. [पूरा पढें] # स्वप्न की डोरी स्वप्न की अद्भुत डोरी रोज़ रात बाँधती है मुझे बातों में कोरी-कोरी ... [पूरा पढें] # सफ़र अभी है बाकी मिलती गई कई मंज़िलें ऊँचे रहे हम उड़ते सोने की चिड़िया की फिर भी बहुत उड़ान अभी है बाकी ... [पूरा पढ...