3.5.06

भँवर

रिश्तों का भँवर
और मैं
कागज़ की एक
छोटी सी नाव ।

सीमा
१२ सितम्बर, १९९९

3 comments:

राम चन्द्र मिश्र said...

क्यों?
छोटी सी क्यों?

अभिनव said...

पढ़कर अच्छा लगा।

थोड़ी तुक भिड़न्ती कर रहे हैं,

सांसों का सफर,
और हम,
चक्का जाम किए,
नक्सली गांव।

seema said...

its realy good