25.7.06

मेरे अंदर के मानव

मैं एक मानव हूँ
पर मेरे अंदर
कई और मानव हैं
– अनगिनत, अनदेखे मानव
जो छिपे रहते हैं मेरे अंदर ।
क्रोध, विनय, विचार,
संवेदना, बुद्धि, आत्म-सम्मान,
जैसे कितने ही नाम हैं उनके ।
समय-समय पर
अलग-अलग मानव
मेरे इस बाहरी मानव पर
हावी होते रहते हैं ।
कभी किसी एक की अह्मियत
बढ़ जाती है
तो बाकी सभी की अह्मियत
नगण्य हो जाती है ।
इसी प्रकार सभी की अह्मियत
सभी का प्रभाव
बारी-बारी से
घटता-बढ़ता रहता है ।
ये सभी भीतरी मानव
मिलकर बनाते हैं
मेरे बाहरी मानव को; मुझको …
पर दुनिया केवल मुझे देखती है-
मेरे बाहरी मानव को …
और मेरे अंदर के मानव
रह जाते हैं छिपे मेरे अंदर ।
इन सब पर
मेरे बाहरी मानव का रूप
र्निभर करता है;
ये सभी नींव की ईंट बने रह जाते हैं
जिन पर मेरे बाहरी मानव की
मजबूती तो र्निभर करती है
पर वो ख़ुद
दुनिया की आँखों से
रह जाते हैं अनदेखे …
अनजाने ... ।


–सीमा
2 जून, 1993

2 comments:

Abhijit Dharmadhikari said...

सीमाजी,

"मेरे अंदर के मानव" रचना बहुत सुंदर है| हर इन्सान अपना प्रतिबिंब आपकी इस सरल रचना में देख सकता है| आपका हार्दिक अभिनंदन और धन्यवाद|

आपकी पहचान मुझे राज की ऑरकुट प्रोफाईल से हासिल हुई|

प्रणाम,
अभिजित

Abhijit Dharmadhikari said...

सीमाजी,

"मेरे अंदर के मानव" रचना बहुत सुंदर है| हर इन्सान अपना प्रतिबिंब आपकी इस सरल रचना में देख सकता है| आपका हार्दिक अभिनंदन और धन्यवाद|

आपकी पहचान मुझे राज की ऑरकुट प्रोफाईल से हासिल हुई|

प्रणाम,
अभिजित