12.8.06

एक और त्रिवेणी

विषय : गुरूर

एहसास तक नहीं था मुझे अपने होने का
नाज़ तुम्हारे साथ होने का जरूर था

तुम मेरे हुए, अपने आप पर गुरूर आ गया


सीमा
१२ अगस्त '०६

2 comments:

Udan Tashtari said...

अच्छा लिखा है, सीमा जी. बहुत बढियां.और त्रिवेणियां पढवायें...
समीर लाल

अनूप भार्गव said...

बहुत बढिया ।
अपनी एक रुबाई याद आ रही है :

तुम को देखा तो चेहरे पे नूर आ गया
हौले हौले ज़रा सा सुरूर आ गया
तुम जो बाँहों में आई लजाते हुए
हम को खुद पे ज़रा साअ गुरूर आ गया ।