प्रकृति की सुन्दरता फूलों से | स्क्रीन सेवर बनाएं और आनंद लें

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प्रकृति की सुन्दरता फूलों से | स्क्रीन सेवर बनाएं और आनंद लें | 

होली की शाम

होली के रंगों की शाम,
उमंगों की शाम,
तरंगों की शाम /

याद आ रही है मुझे
अपने गाँव की
होली की शाम /
'होरी' गाती
गावँ के मर्दों की
टोली की शाम /
हर एक चेहरे पर
गुलाल से सजी
रंगोली की शाम /
गुलाल से गुलाबी करने
घर आती
हर सखी-सहेली की शाम /
रंगे हुए चेहेरे को
घूँघट के पीछे छुपाती
दुल्हन नई-नवेली की शाम /

बहारों की शाम,
फुहारों की शाम,
मस्ती की शाम,
सुस्ती की शाम /
याद आ रही है मुझे
अपने गाँव की
होली की शाम /

- सीमा
२३ मार्च, १९९७, ब.व.
(होलिका-दहन)

टिप्पणियाँ

Udan Tashtari ने कहा…
वाकई,

जैसे जैसे होली पास आ रही है...
मुझे भी गाँव की बहुत याद आ रही है...
आपकी कविता ऎसा अहसास करा रही है...
जैसे वो मेरे गालों पे रंग लगा रही है...

बहुत सुंदर..बधाई.

समीर लाल
Dr. Seema Kumar ने कहा…
समीर जी,

बहुत धन्यवाद |

गाँव की होली,
गाँव की मस्ती
और कहाँ मिल पाएगी |
शहरों में अब
सभ्य हुए हम
मिट्टी कहाँ मिल पाएगी |

कभी कभी अपने गाँव में होली मनाने का मौका मिला था इन श्बदों में उन्हीं की याद है | और वास्तव में हम तथाकथित आधुनिक एवँ सभ्य लोगों की होली में वो बात एवँ वो आनंद कहाँ जो गाँव की होली में मुझे मिली थी |

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