कविता संग्रह ‘पराग और पंखुड़ियाँ’ अब फ्लिपकार्ट और इन्फीबीम पर उपलब्ध मेरी कविता संग्रह ‘पराग और पंखुड़ियाँ’ अब फ्लिपकार्ट और इन्फीबीम पर भी उपलब्ध है । कृपया पढ़कर अपनी राय अवश्य दें: मेरी कविता संग्रह ‘पराग और पंखुड़ियाँ’ फ्लिपकार्ट और इन्फीबीम पर उपलब्ध जैसा कि मैंने अपने पिछले पोस्ट में लिखा था राष्ट्रीय फैशन टेक्नोलॉजी संस्थान, चेन्नई , में मनाए जा रहे हिन्दी पखवाड़ा 2015 के पुरस्कार वितरण एवं समापन समारोह के साथ मेरी (सीमा कुमार, सह आचार्य, निफ्ट, चेन्नई) हिन्दी कविता-संग्रह “पराग और पंखुड़ियाँ” का पुस्तक विमोचन भी किया गया। किताब का लोकार्पण निफ्ट, चेन्नई, की निदेशिका डॉ. अनिता मनोहर ने किया। विमोचन में संस्थान के उप निदेशक, मेरे पति एवं माता-पिता भी सहभागी रहे। किताब का प्रकाशन हिंद युग्म प्रकाशन, नई दिल्ली, ने किया है। विमोचन के दौरान निफ्ट, चेन्नई, की निदेशिका डॉ. अनीता मनोहर द्वारा हिन्द युग्म प्रकाशन के श्री शैलेश भारतवासी का स्वागत ...
कविता - शब्दों का ताना-बाना, शब्दों का जाल । कल्पना के हथकरघे पर अक्षर - अक्षर से शब्दों के सूत कात, जुलाहा बन शब्दों के सूत से वाक्यों का कपड़ा बुन और दर्जी बन एहसास की कैंची से अनचाहे शब्द कतर भावों की सूई से सी कर कवि तैयार कर देता है कविता का मनोहारी वस्त्र; कविता - एक मोहक श्ब्द-जाल । - सीमा २८ अप्रैल, १९९५
एक तितली उड़ी थी अपने बागानों से शहर की ओर और खो गई चमचमाती रोशनी और रोशनी के चारों ओर मंडराते पतंगों के बीच । फूल-पत्तों के रंग नहीं थे, तितली के पीछे भागते बच्चे नहीं थे । हाँ, धूल और धुँए से मलिन होते उसके रंग-बिरंगे पंख थे किसी बहुमंजिली इमारत की मुंडेर पर बैठे एकाकीपन का साथ था, और एक सावाल कि आखिर किसकी, किस चीज की तलाश में आई थी वह शहर तक मीलों की उड़ान भरकर रूक-रूक कर, थक-हार कर, जाने क्या-क्या दाँव पर लागा कर... । क्या उसे अपने बागानों का रास्ता फिर से कोई बता सकता था ? या फिर क्या वह ढ़ूँढ़ सकती थी, बना सकती थी कोई नया उपवन फूल-पत्तियों से भरा, रंगों से भरा, खिलखिलाते बच्चों से भरा, एक अलग कोना इन बहुमंजिली इमारतों के बीच ? - सीमा कुमार ६ जून, २००७
टिप्पणियाँ
kkaisi hain aap?
tasveeren bahut hi aachi hai, bholi hain,. sachhi hain. aacha laga aapko online dekhkar
www.merakamra.blogspot.com
www.stillwala.blogspot.com