होली के रंगों की शाम,
उमंगों की शाम,
तरंगों की शाम /
याद आ रही है मुझे
अपने गाँव की
होली की शाम /
'होरी' गाती
गावँ के मर्दों की
टोली की शाम /
हर एक चेहरे पर
गुलाल से सजी
रंगोली की शाम /
गुलाल से गुलाबी करने
घर आती
हर सखी-सहेली की शाम /
रंगे हुए चेहेरे को
घूँघट के पीछे छुपाती
दुल्हन नई-नवेली की शाम /
बहारों की शाम,
फुहारों की शाम,
मस्ती की शाम,
सुस्ती की शाम /
याद आ रही है मुझे
अपने गाँव की
होली की शाम /
- सीमा
२३ मार्च, १९९७, ब.व.
(होलिका-दहन)
7.3.06
1.3.06
रिश्ता
तुम्हारे और मेरे बीच
आँसुओं का रिश्ता है,
दर्द की एक डोर है
जो बाँधे हुए है
हम दोनों को /
दर्द से सभी डरते हैं,
सभी दूर भागते हैं
फिर भी
जाने क्यों
यही दर्द,
यही पीडा
हम दोनों को
जोडे हुए है
एक दूसरे से,
इस समस्त सृष्टी से /
आपस में
छोटे-छोटे दर्द बाँटकर
यह डोर और मजबूत हो जाती है
पर
दर्द से सभी डरते हैं
शायद तुम भी
और मैं भी
तभी आपस में
दर्द का बाँटना
कम होता गया
और हमारे बीच की डोर
हमारे बीच के
फासले को नापती हुई
ज्यों की त्यों
तनी हुई है /
-सीमा
१९ दिसम्बर, १९९६
ब.व.
आँसुओं का रिश्ता है,
दर्द की एक डोर है
जो बाँधे हुए है
हम दोनों को /
दर्द से सभी डरते हैं,
सभी दूर भागते हैं
फिर भी
जाने क्यों
यही दर्द,
यही पीडा
हम दोनों को
जोडे हुए है
एक दूसरे से,
इस समस्त सृष्टी से /
आपस में
छोटे-छोटे दर्द बाँटकर
यह डोर और मजबूत हो जाती है
पर
दर्द से सभी डरते हैं
शायद तुम भी
और मैं भी
तभी आपस में
दर्द का बाँटना
कम होता गया
और हमारे बीच की डोर
हमारे बीच के
फासले को नापती हुई
ज्यों की त्यों
तनी हुई है /
-सीमा
१९ दिसम्बर, १९९६
ब.व.
28.2.06
विमान
बनाया होगा
इंसान ने
चाँद पर
उतरने के लिए
कोई विमान
पर
क्या कभी
किसी इंसान ने
बनाया है
कोई ऐसा विमान
जो
इंसान के ही
मन की
गहराई में
उतर सके ?
–सीमा
28 अप्रैल, 1995
स.
इंसान ने
चाँद पर
उतरने के लिए
कोई विमान
पर
क्या कभी
किसी इंसान ने
बनाया है
कोई ऐसा विमान
जो
इंसान के ही
मन की
गहराई में
उतर सके ?
–सीमा
28 अप्रैल, 1995
स.
26.2.06
कैसे लिखूँ
कैसे लिखूँ कुछ
आज शब्द मानो
पंख लगा
उड़ जाते हैं ।
भागूँ जब मैं
पीछे उनके
किसी अनजान दिशा
मुड़ जाते हैं ।
- सीमा
28 नवम्बर, 1994
आज शब्द मानो
पंख लगा
उड़ जाते हैं ।
भागूँ जब मैं
पीछे उनके
किसी अनजान दिशा
मुड़ जाते हैं ।
- सीमा
28 नवम्बर, 1994
15.2.06
ज़िन्दगी के रंग
ज़िन्दगी कभी-कभी
कहीं खत्म सी हो जाती है,
कहीं थम सी जाती है
और फिर कहीं
शुरू हो जाती है /
कहीं उमड़ जाती है
कहीं मचल जाती है
कहीं रेत के बवन्डरों सी
उड़ती चली जाती है /
कहीं हरे-हरे पत्तों पर पडी़
बरखा की बूँदों सी
झिलमिलाती जाती है /
कहीं ठंढी हवाओं सी
बस छू कर चली जाती है /
यूँ ही बदलती रूप रंग
ज़िन्दगी चली जाती है /
थाम ले जिस पल को
वही बस अपना है ;
बाकी की ज़िन्दगी रेत-सी
यूँ ही फिसल जाती है /
- सीमा
१४ अप्रैल, २००४.
सि.
कहीं खत्म सी हो जाती है,
कहीं थम सी जाती है
और फिर कहीं
शुरू हो जाती है /
कहीं उमड़ जाती है
कहीं मचल जाती है
कहीं रेत के बवन्डरों सी
उड़ती चली जाती है /
कहीं हरे-हरे पत्तों पर पडी़
बरखा की बूँदों सी
झिलमिलाती जाती है /
कहीं ठंढी हवाओं सी
बस छू कर चली जाती है /
यूँ ही बदलती रूप रंग
ज़िन्दगी चली जाती है /
थाम ले जिस पल को
वही बस अपना है ;
बाकी की ज़िन्दगी रेत-सी
यूँ ही फिसल जाती है /
- सीमा
१४ अप्रैल, २००४.
सि.
10.2.06
6.2.06
ख्वाब
लोग
ख्वाबों से हक़ीकत
बुनने की कोशिश करते हैं /
मैं अकसर कोशिश करती हूँ
हक़ीकत में
ख्वाबों को ढूँढ सकूँ /
- सीमा
६ फरवरी, २००६
ख्वाबों से हक़ीकत
बुनने की कोशिश करते हैं /
मैं अकसर कोशिश करती हूँ
हक़ीकत में
ख्वाबों को ढूँढ सकूँ /
- सीमा
६ फरवरी, २००६
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