22.9.15

निमंत्रण - मेरी हिन्दी कविता-संग्रह “पराग और पंखुड़ियाँ” का पुस्तक विमोचन

हिन्दी पखवाड़ा से जुड़ कर अच्छा लगा । कुछ और बातें निफ्ट, चेन्नई, में हिन्दी पखवाड़ा में हिन्दी पखवाड़ा और मुझसे जुड़ी ।

"पराग और पंखुड़ियाँ"

मुझे यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि २३ सितम्बर २०१५ को हिन्दी पखवाड़ा के पुरस्कार वितरण एवं समापन समारोह के साथ साथ निफ्ट, चेन्नई, में मेरी हिन्दी कविता-संग्रह “पराग और पंखुड़ियाँ” का पुस्तक विमोचन भी किया जाएगा ।



"पराग और पंखुड़ियाँ" का आवरण 

१० से २३ सितम्बर २०१५ तक राष्ट्रीय फैशन टेक्नोलॉजी संस्थान, चेन्नई, में मनाए जा रहे हिन्दी पखवाड़ा के पुरस्कार वितरण एवं समापन समारोह के साथ काव्यात्मक एवं संगीतमय संध्या में आप सादर आमंत्रित हैं ।

दिनांक एवं समय: २३ सितम्बर २०१५, ३:३० - ५:३० अपराह्न

- काव्यात्मक एवं संगीतमय संध्या
- पुस्तक –विमोचन: श्रीमती सीमा कुमार की हिन्दी कविता-संग्रह “पराग और पंखुड़ियाँ” का विमोचन
- पुरस्कार वितरण एवं समापन समारोह

निमंत्रण

**अक्टूबर २०१५:
मेरी कविता संग्रह ‘पराग और पंखुड़ियाँ’ अब फ्लिपकार्ट और इन्फीबीम पर भी पर उपलब्ध है | कृपया पढ़कर अपनी राय अवश्य दें:

फ्लिपकार्ट: http://www.flipkart.com/item/9789384419165

इन्फीबीमhttp://www.infibeam.com/Books/parag-aur-pankhudiyan-hindi-seema-kumar/9789384419165.html


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14.9.15

'हिन्दी दिवस' की हार्दिक शुभकामनाएँ

'हिन्दी दिवस' की हार्दिक शुभकामनाएँ |


१४ सितम्बर को हम हिन्दी दिवस के रूप में मनाते हैं, यह आपको ज्ञात होगा | राष्ट्रीय फैशन टेक्नोलॉजी संस्थान, चेन्नई, में १० से २३ सितम्बर २०१५ तक हिन्दी पखवाड़ा  मनाया  जा रहा है । इस अवसर पर हिन्दी समिति और साहित्यिक संघ, निफ्ट, चेन्नई, द्वारा निफ्ट परिसर में छात्र, कर्मचारी एवं शिक्षकों के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं | सभी प्रतियोगिताओं के लिए नकद पुरस्कार जीता जा सकता है |
  • पोस्टर डिजाइन प्रतियोगिता
  • लघु कहानी / सृजनात्मक लेखन 
  • हिन्दी कविता प्रतियोगिता
  • निबन्ध 
  • प्रश्नोत्तरी
  • हिन्दी सुलेखन 
  • रचनात्मक विज्ञापन

मुझे यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि २३ सितम्बर २०१५ को पुरस्कार वितरण एवं समापन समारोह के साथ साथ निफ्ट, चेन्नई, में मेरी हिन्दी कविता-संग्रह “पराग और पंखुड़ियाँ” का पुस्तक विमोचन भी किया जाएगा । 

14.2.13

नन्हा सा पल

मेरे एक पल ने
आज फिर मुझसे कहा है
मैं तुम्हारे संग
अपना वह
नन्हा सा पल बाँट लूँ
जो अब तक
बस मेरा होकर रहा है ।
वह पल
जिसमें सिर्फ मैं हूँ,
वह नन्हें कण सा
नन्हा पल
जिसमें सिमट कर
मैं भी एक कण सी
हो गई हूँ
और उसमें सिमट गए हैं
मेरे दुःख-सुख,
मेरे आँसू और खुशी,
आशा और निराशा,
प्रेम और नफरत,
दर्द और चुभन,
तृष्णा और अभिलाषा,
उल्लास और अवसाद ।

वह पल
बस मेरा ही होकर
नहीं रहना चाहता
वह तुम्हारा भी होना चाहता है ।
तुम्हारा भी तो
ऐसा ही नन्हें कण सा
कोई पल होगा,
तुम्हारा बिल्कुल अपना,
केवल तुम्हारा पल ... ।
क्या बाँटोगे
मेरे पल के साथ
तुम अपना पल ?


- सीमा कुमार
१६/६/२००१

* यह कविता 'हिन्द-युग्म' पर प्रथम प्रकाशित हुई और वहां पढ़ी जा सकती हैं | 

22.11.12

बादल का एक टुकड़ा

मैं
बादल का
एक टुकड़ा हूँ
और तुम
बरखा की शीतल बूँदें |
मैं
खाली - खाली सा
बादल का एक टुकड़ा
और तुम्हारा प्यार
बादल टुकडे को
भर देने वाली,
उसे उसका स्वरूप देने वाली
जल की असंख्य बूँदें |
मैं
बादल का
एक छोटा सा टुकड़ा
और तुम
मेरा पूरा आसमान,
मैं
सीमाओं से निर्मित
और तुम अनंत आकाश

- सीमा कुमार
१७/६/९९

* यह कविता 'हिन्द-युग्म' पर प्रथम प्रकाशित हुई और वहां पढ़ी जा सकती हैं | 

2.10.12

सफ़र अभी है बाकी


स्वराज से सुराज तक 
विभाजन से मिलाप तक
मेरी मातृभूमि का अभी
लंबा सफर है बाकी।

तंदूर से उत्थान तक 
अशिक्षा से ज्ञान तक
कई अंधेरे कोनों में 
उजाला फैलाना है बाकी।

तय किए साठ बरस 
सफ़र लंबा था मगर 
ऊँचे-नीचे रास्तों पर अभी 
अनन्त का सफर है बाकी। 

मिलती गई कई मंज़िलें 
ऊँचे रहे हम उड़ते 
सोने की चिड़िया की फिर भी
बहुत उड़ान अभी है बाकी। 

- सीमा कुमार
१४ अगस्त , २००७

* यह कविता 'हिन्द-युग्म' पर प्रथम प्रकाशित हुई और वहां पढ़ी जा सकती हैं | 

25.8.12

अंतर्द्वन्द्व

मैं हर दिन
तारों सी झिलमिल ।
आँखें मेरी
सदैव स्वपनिल -
रोज पूछती मुझसे
आज कौन सा
स्वप्न सजाऊँ ?
मिटाना है तुम्हें
कौन सा अंधियारा ?
किस अंतर्द्वन्द्व में
दीप जलाऊँ,
करे जो रौशन
और आशान्वित राहें ।

रोज़ जलाती हूँ खुद को
रोज़ प्रज्वलित
होती है एक आग
इस आशा में -
स्वयं के ही
हवन कुंड में
स्वाहा हो जाऊँ
और उस राख से
पुनर्निमित हो
निकल आऊँ निर्मल मैं ।
फीनिक्स की तरह ।

देह - विकार, कष्ट, क्लेश,
लोभ, क्षोभ और अंतर्द्वन्द्व
नहीं मिटते इस जीवन में ।
कभी - कभी मिट जाता है
आत्मा का एहसास ।
नहीं मिटती क्यों
अपने ही दुर्गुणों की,
दुर्बलताओं की पोथी ?
क्यों पन्ने उसमें हर दिन
जुड़ते ही जाते ?
क्या हर अर्जुन को
मिलते हैं कृष्ण ?
और जो अर्जुन
पांडव - बहन होती
तब भी क्या उसे
मिलते कृष्ण,
मिलती गीता ?


- सीमा कुमार
४ सितंबर २००७

यह कविता 'हिन्द-युग्म' पर प्रथम प्रकाशित हुई और वहां पढ़ी जा सकती हैं | 

प्रकृति और पंक्षियों को अर्पित मेरी कृति

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