जाड़े की धूप
जैसे किसी प्यासे को
रेगिस्तान में
मीठा पानी मिल गया हो ।
सर्द रातों के बाद
ऐसी खिली
जाड़े की धूप
जैसे सूर्यमुखी ने
धीरे से
अपनी सुंदर,
बड़ी, पीली पंखुड़ियाँ
फैला ली हो ।
भागती - दौड़ती जिन्दगी
और वातानुकूलित कमरों के बाहर
जाड़े की धूप में बैठ
ऐसा लगा जैसे
बरसों से चैन की नींद
सोए नहीं;
पुकारने लगी
सुहानी धूप
अपनी गोद में
सुलाने को ।
जाड़े की धूप
जैसे
ममता का आँचल ।
- सीमा कुमार
६ जनवरी, २००७,
गुड़गाँव ।
6.1.07
जाड़े की धूप
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
प्रकृति और पंक्षियों को अर्पित मेरी कृति
प्रकृति और पंक्षियों को अर्पित - वस्त्रों ( टी-शर्ट्स ) के लिए मेरी कृति : वीडियो - प्रकृति और पंक्षियों से प्रेरित डिज़ाइन: और पढ़ें ... फ...
-
कविता संग्रह ‘पराग और पंखुड़ियाँ’ अब फ्लिपकार्ट और इन्फीबीम पर उपलब्ध मेरी कविता संग्रह ‘पराग और पंखुड़ियाँ’ अब फ्लिपक...
-
कविता - शब्दों का ताना-बाना, शब्दों का जाल । कल्पना के हथकरघे पर अक्षर - अक्षर से शब्दों के सूत कात, जुलाहा बन शब्दों के सूत से वाक्यों का क...
-
एक तितली उड़ी थी अपने बागानों से शहर की ओर और खो गई चमचमाती रोशनी और रोशनी के चारों ओर मंडराते पतंगों के बीच । फूल-पत्तों के रंग नहीं थे, तित...
5 टिप्पणियां:
सुंदर कृति!!!
जाड़े की धूप में बैठकर वैसा ही आराम मिलता है जैसा तेज गर्मी में नदी के जल में बैठने पर मिलता है
वाह एकदम सही अहसास व्यक्त किए आपने धूप के बारे में।
सच ही तो है , जाडे की धूप का मजा ही कुछ अलग है, बहुत सुदंर प्रस्तुति ।
सर्द रातों के बाद
ऐसी खिली
जाड़े की धूप
जैसे सूर्यमुखी ने
धीरे से
अपनी सुंदर,
बड़ी, पीली पंखुड़ियाँ
फैला ली हो।
अति सुन्दर चित्रण सीमा कुमार जी,
जाड़े की धूप के लिए लिखी गई आपकी ये पंक्तियाँ उतनी ही सुन्दर और सुहावनी है, जितनी जाड़े में धूप।
आपका काव्य लेखन बहुत अच्छा लगा और आप द्वारा अपने ब्लॉग पर किया गया अपनी कला का प्रदर्शन और भी उम्दा, मुझे बहुत पसंद आया।
- गिरिराज जोशी "कविराज"
आप सभी की टिप्प्णियों एवँ उत्साहवर्धन के लिए बहुत - बहुत धन्यवाद ।
- सीमा कुमार
एक टिप्पणी भेजें